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प्रस्तुत "सदाचार" ग्रन्थ श्री आदिशंकराचार्यजी की रचना है. इसके ५४ श्लोकों में आचार्यजी ने आत्मज्ञ सत्पुरुष के आचरण का वर्णन किया है. यह ग्रन्थ, मुमुक्ष व् जिज्ञासु साधकों के लिए आचरण के सम्ब्ध में उपयोगी मार्गदर्शन करता है.

ग्रन्थ के प्रारम्भ में इसका प्रयोजन बताते हुए आचार्य कहते हैं-योगिनां ज्ञानसिद्धये" ार्थता यह जिज्ञासुओं द्वारा ज्ञान सिद्धि प्राप्त करने हेतु हैं. ग्रन्थ समापन में फलश्रुति बताते हुए आचार्य कहते है. "संसारसागरात शीघ्रं मुच्यन्ते"  ार्थता ग्रन्थ का नित्य अनुसंधान जन्म-मरण रूपी संसार सागर से मुक्त करने वाला है

यह प्रसाद रूप ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है जिसका स्वामीजी ने बहुत सुन्दर और विस्तृत विवेचन किया है. महाराष्ट्र के महान संत श्री हंसराज महाराज कृत व्याख्या के ओवी पदों का संदर्भ देने से यह विवेचन सारगभित और स्पष्ट है. यह ग्रन्थ जिज्ञासुऔ को साधना हेतु निदेशन देने के लिए तथा सिद्ध महात्माऔ को आत्म-विचार पूर्वक स्वानन्द में रमे रहने के लिए उपयुक्त है.

S2028
in stock INR 135
Chinmaya Prakashan
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Sadachara

SKU: S2028
₹135.0
Publisher: Chinmaya Prakashan
ISBN: 978-81-7597-555-2
Language: Hindi
Author: Swamini Vimalananda
Binding: Paperback
Tags:
  • Self Development, Self Help,Motivation

Description of product

प्रस्तुत "सदाचार" ग्रन्थ श्री आदिशंकराचार्यजी की रचना है. इसके ५४ श्लोकों में आचार्यजी ने आत्मज्ञ सत्पुरुष के आचरण का वर्णन किया है. यह ग्रन्थ, मुमुक्ष व् जिज्ञासु साधकों के लिए आचरण के सम्ब्ध में उपयोगी मार्गदर्शन करता है.

ग्रन्थ के प्रारम्भ में इसका प्रयोजन बताते हुए आचार्य कहते हैं-योगिनां ज्ञानसिद्धये" ार्थता यह जिज्ञासुओं द्वारा ज्ञान सिद्धि प्राप्त करने हेतु हैं. ग्रन्थ समापन में फलश्रुति बताते हुए आचार्य कहते है. "संसारसागरात शीघ्रं मुच्यन्ते"  ार्थता ग्रन्थ का नित्य अनुसंधान जन्म-मरण रूपी संसार सागर से मुक्त करने वाला है

यह प्रसाद रूप ग्रन्थ संस्कृत भाषा में है जिसका स्वामीजी ने बहुत सुन्दर और विस्तृत विवेचन किया है. महाराष्ट्र के महान संत श्री हंसराज महाराज कृत व्याख्या के ओवी पदों का संदर्भ देने से यह विवेचन सारगभित और स्पष्ट है. यह ग्रन्थ जिज्ञासुऔ को साधना हेतु निदेशन देने के लिए तथा सिद्ध महात्माऔ को आत्म-विचार पूर्वक स्वानन्द में रमे रहने के लिए उपयुक्त है.

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