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प्रत्येक व्यक्ति कष्ट में है- धनी, निर्धन, युवा, वृद्ध| संसार में हर चीज़ नष्ट हो रही है| स्थायी कुछ भी नहीं| हमारे सुख अन्तत: दु:खदायीे ही हैं| मनुष्य अपनी सम्पति पर गर्व करता है और नश्वर चीज़ों के पीछे दिन- रात भागता रहता है| इन तथ्यों पर ध्यान देने वाले व्यक्ति के मन में सहज ही इस प्रकार के प्रश्न उठते है -

में कौन हूँ?

संसार का क्या रूप है?

मनुष्य के अस्तित्व का क्या उदेश्य है?

ज्ञान और कथाओं का भंडार, योगविशेष्ट, इन सभी प्रश्नों का समाधान करता है| हिन्दू-संस्कृति का सम्पूर्ण दर्शन इसमें समाहित है|

स्वामी तेजोमयानंदजी ने अनेक आध्यात्मिक पुस्तकों की व्याख्या की है| उनकी स्वरचित पुस्तकों की संख्या भी बहुत बड़ी है| विश्व में दूर-दूर तक भ्रमण कर वे प्रवचन देते है और जनता का वेदान्त से परिचय कराते है|

Y2001
in stock INR 115
Chinmaya Prakashan
1 1

Yogavasishtha Sarsangraha (हिंदी)

SKU: Y2001
₹115
Publisher: Chinmaya Prakashan
ISBN: 978-81-7597-373-2
Language: Hindi
Author: Swami Tejomayananda
Binding: Paperback
Tags:
  • Spirituality, Spiritual Knowledge, Philosophy, Awakening

Description of product

प्रत्येक व्यक्ति कष्ट में है- धनी, निर्धन, युवा, वृद्ध| संसार में हर चीज़ नष्ट हो रही है| स्थायी कुछ भी नहीं| हमारे सुख अन्तत: दु:खदायीे ही हैं| मनुष्य अपनी सम्पति पर गर्व करता है और नश्वर चीज़ों के पीछे दिन- रात भागता रहता है| इन तथ्यों पर ध्यान देने वाले व्यक्ति के मन में सहज ही इस प्रकार के प्रश्न उठते है -

में कौन हूँ?

संसार का क्या रूप है?

मनुष्य के अस्तित्व का क्या उदेश्य है?

ज्ञान और कथाओं का भंडार, योगविशेष्ट, इन सभी प्रश्नों का समाधान करता है| हिन्दू-संस्कृति का सम्पूर्ण दर्शन इसमें समाहित है|

स्वामी तेजोमयानंदजी ने अनेक आध्यात्मिक पुस्तकों की व्याख्या की है| उनकी स्वरचित पुस्तकों की संख्या भी बहुत बड़ी है| विश्व में दूर-दूर तक भ्रमण कर वे प्रवचन देते है और जनता का वेदान्त से परिचय कराते है|

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